DNA Analysis: आखिर संजय राउत से जुड़ा पात्रा चॉल घोटाला है क्या? जिसने बढ़ाईं उद्धव के करीबी की मुश्किलें

DNA Analysis: क्या भ्रष्टाचार के आरोपों में की गई कार्रवाई से ये कहते हुए बचा जा सकता है कि सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है? सोचिए ऐसा क्यों है कि जब देश में किसी नेता के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई होती है तो उसका पूरी तरह से राजनीतिकरण कर दिया जाता है और ये कहा जाता है कि वो नेता तो विपक्ष में है इसलिए ये सब कार्रवाई की जा रही है? पिछले 24 घंटे से हमारे देश में यही सब हो रहा है. शिवसेना के नेता संजय राउत को आज कोर्ट ने 4 अगस्त तक ED की कस्टडी में भेज दिया. लेकिन इस पूरे मामले को ऐसे पेश किया गया, जैसे ED संजय राउत को विपक्ष में होने की सजा दे रहा है? उन पर ज्यादती की जा रही है. हमारे देश में नेताओं के प्रति ये सहानुभूति कोई नई नहीं है. जब भी किसी नेता पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते हैं तो वो इसे राजनीति से जोड़ देता है.

राजनीति की आड़ में कुछ छिपाया जा रहा है?

यानी राजनीति के सहारे नेता पूरे मामले को गोलमोल कर जाते हैं और उनके द्वारा किए गए घोटालों और भ्रष्टाचारों पर ईमानदारी से कभी कोई बात हो ही नहीं पाती लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे. आज हम आपको संजय राउत पर लगे तमाम आरोपों का सच बताएंगे और इस बात का भी विश्लेषण करेंगे कि जिस देश में ईमानदारी का सारा बोझ आम आदमी पर डाल दिया जाए और नेताओं को बेईमानी करने के लिए खुला छोड़ दिया जाए, उस देश में डेमोक्रेसी वाकई खतरे में आ जाती है. सबसे पहले आपको ये बताते हैं कि क्या संजय राउत की गिरफ्तारी वाकई एक राजनीतिक प्रकरण है?

संजय राउत पर गंभीर आरोप

ED के मुताबिक संजय राउत पर ना सिर्फ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं बल्कि ये दावा भी है कि उन्होंने अपनी पहुंच का इस्तेमाल करके सरकारी अधिकारियों को प्रभावित किया. गलत तरीके से सम्पत्ति खरीदी और उनकी पत्नी के बैंक खातों में लाखों रुपये जमा हुए. इस पूरे घोटाले को पात्रा चॉल घोटाले या पात्रा चॉल Redevelopment Project Scam के नाम से भी जाना जाता है. दरअसल, उत्तरी मुंबई के गोरेगांव में एक इलाका है, जिसे सिद्धार्थ नगर कहते हैं. यही सिद्धार्थ नगर पात्रा चॉल के नाम से मशहूर है. लगभग 47 एकड़ की जमीन पर फैले इस इलाके में एक समय 672 घर हुआ करते थे. इसके बाद Maharashtra Housing and Area Development Authority ने तय किया कि वो इस इलाके में रहने वाले लोगों को नए घर बना कर देगी और इस जगह को Redevelop किया जाएगा.

क्या है पूरा मामला?

पात्रा चॉल में स्थित जो 672 घर थे, वहां रहने वाले लोगों को ये सपना दिखाया गया कि सरकार बिल्डर्स के साथ मिल कर उन्हें पक्के घर बना कर देगी. यानी हर परिवार का अपना एक Flat होगा. इस सपने ने इन लोगों को एक नई उम्मीद दी और यहां रहने वाले लोग Redevelopment के लिए अपने घर खाली करने को तैयार हो गए और इसके बाद वर्ष 2008 में एक Agreement यानी समझौता हुआ. ये समझौता तीन पार्टियों के बीच हुआ. पहले लोग वो थे, जिनके यहां पर घर हुआ करते थे. दूसरी पार्टी थी, म्हाडा यानी Maharashtra Housing and Area Development Authority और तीसरी पार्टी थी एक Real Estate Company, जिसका नाम था Guru Ashish Construction Private Limited. इस समझौते के तहत इस कंपनी को 47 एकड़ की इस जमीन पर कुल 16 बिल्डिंग तैयार करनी थी. जिनमें पात्रा चॉल के लोगों के लिए 672 Flats तैयार होने थे. इसके अलावा इस कंपनी को म्हाडा को अलग से 1 लाख 11 हजार 476 वर्ग मीटर एरिया Construction Build Up के लिए देना था.

इन तमाम Redevelopments Projects के बाद जो जमीन बचती, उसे ये कंपनी Develop करके यानी यहां Private Developers के साथ Flats बना कर लोगों को बेच सकती थी. हालांकि यहां शर्त ये थी कि इस कंपनी को पहले 672 Flats तैयार करने थे. लेकिन इसने ऐसा नहीं किया. आरोप है कि समझौते के विरुद्ध इसने बाकी बची हुई जमीन को पहले ही सात बिल्डर्स को बेच दी. जिससे इस कंपनी को 901 करोड़ रुपये हासिल हुए.

इसके अलावा इस कंपनी ने इसी जमीन पर एक Housing Project भी शुरू किया, जिसे Meadows नाम दिया गया. इस नाम की सोसायटी में कुल 458 Flats बनाए जाने थे और आरोप है कि इस कंपनी ने हाउसिंग सोसायटी तैयार किए बिना ही एडवांस में Flats बेचकर 138 करोड़ रुपये जुटा लिए और इस तरह जिस जमीन पर सबसे पहले पात्रा चॉल के लोगों के लिए 672 Flats बनने थे, उस जमीन के काफी हिस्से को बेच कर इस कंपनी ने 1 हजार 39 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम जुटा ली और ये पूरा भ्रष्टाचार किया गया.

इनमें संजय राउत का क्या रोल?

अब आपके मन में ये सवाल होगा कि इस सबमें संजय राउत की क्या भूमिका थी? तो जिस Guru Ashish Construction Private Limited नाम की कंपनी पर आर्थिक गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उस कंपनी में प्रवीण राउत नाम का एक व्यक्ति डायरेक्टर था और प्रवीण राउत संजय राउत के बहुत खास माने जाते हैं. ED के मुताबिक प्रवीण राउत ने म्हाडा की जमीन को गलत तरीके से बिल्डर्स को बेचा और HDIL नाम की Construction Company से 112 करोड़ रुपये की राशि भी जुटा ली. जिसमें से आरोप है कि एक करोड़ 6 लाख रुपये संजय राउत और उनकी पत्नी को मिले.

2009 में प्रवीण राउत के द्वारा संजय राउत की पत्नी वर्षा राउत को 55 लाख रुपये का लोन दिया गया और ये पैसा वर्षा राउत ने एक Flat खरीदने के लिए इस्तेमाल किया. इसके बाद 2011 में प्रवीण राउत की एक कंपनी द्वारा संजय राउत और वर्षा राउत को साढ़े 37 लाख रुपये दिए गए और बड़ी बात ये है कि इस पैसे से संजय राउत और उनकी पत्नी ने Garden Court में एक और Flat खरीदा. ED का ये भी दावा है कि प्रवीण राउत की जिस कंपनी से संजय राउत और उनकी पत्नी को साढ़े 37 लाख रुपये मिले, उस कंपनी में उनके द्वारा लाखों रुपये निवेश किए गए थे. संजय राउत ने इस कंपनी में 17 लाख 10 हजार रुपये और उनकी पत्नी ने 12 लाख 40 हजार रुपये इस कंपनी में निवेश किए थे और ED का कहना है कि ये पैसा भी उन्हें बाद में वापस मिल गया था और ऊपर से प्रवीण राउत ने इस कंपनी के जरिए साढ़े 37 लाख रुपये अलग से संजय राउत और उनकी पत्नी को दिए. जिससे Garden Court में Flat खरीदा गया.

संजय राउत ने इन लाखों रुपयों का क्या किया?

इसके अलावा एक और कंपनी में निवेश करने के बदले में वर्षा राउत को 13 लाख 94 हजार रुपये मिले थे. इस पैसे का संजय राउत और उनकी पत्नी ने क्या किया, अभी ED इसकी जांच कर रहा है. कुल मिलाकर ED ने संजय राउत और उनकी पत्नी से संबंधित एक करोड़ 6 लाख रुपये की मनी ट्रेल का पता लगा लिया है और बाकी मनी ट्रेल की जांच अभी जारी है. हालांकि ये कहानी यहीं खत्म नहीं होती. 2010-11 में संजय राउत ने मुंबई के अलीबाग में 10 Plot खरीदे. ये सभी Plots वर्षा राउत और स्वपना पाटकर के नाम से खरीदे गए. यहां नोट करने वाली बात ये है कि स्वपना पाटकर ने ED को लिखी अपनी शिकायत में ये कहा है कि संजय राउत उन्हें इस मामले में चुप रहने के लिए धमका रहे हैं.

आसान भाषा में समझें ऐसी है कहानी

सरल शब्दों में कहें तो कहानी कुछ इस तरह है कि मुंबई में एक जमीन के टुकड़े पर 672 घर हुआ करते थे. जिनमें रहने वाले लोगों को म्हाडा ने ये सपना दिखाया कि उन्हें उनकी जगह पर Flats बना कर दिए जाएंगे और जिस कंपनी को इस काम का Contract मिला. उसने Flats तो नहीं बनाए लेकिन बाकी जमीन बिल्डर्स को बेच दी और इस कंपनी के द्वारा संजय राउत और उनकी पत्नी के बैंक खातों में लाखों रुपये जमा किए गए और संजय राउत ने भी इस दौरान खूब सम्पत्तियां खरीदी. अब सोचिए, इस पूरे मामले में गलत किसके साथ हुआ? संजय राउत के साथ, जिन पर एक घोटाला करने वाली कंपनी से सांठगांठ करने और सम्पत्ति बनाने के आरोप हैं? या गलत उन लोगों के साथ हुआ, जिन्होंने पात्रा चॉल में Flat मिलने का सपना देखा था? हमारे देश में जब भी कोई नेता भ्रष्टाचार के किसी मामले में फंसता है तो वो यही कहता है कि उसे फंसाया जा रहा है?

नई नहीं है संजय राउत की कहानी

ये स्क्रिप्ट हर उस नेता के द्वारा फॉलो की जाती है, जिस पर इस तरह के आरोप लगते हैं और संजय राउत कुछ नया नहीं कर रहे. हम ये नहीं कह रहे कि उन पर लगे सभी आरोप सही हैं? इसका जवाब तो ED ही दे सकता है. लेकिन इसके लिए ED को जांच करने देना जरूरी है. ये कहना कि ED दबाव में काम कर रहा है या उसका दुरुपयोग हो रहा है, ये असल में इस मामले से बचने का एक बहाना है. आज उद्धव ठाकरे ने संजय राउत का बचाव किया और कहा कि वो उनके साथ इस मुश्किल वक्त में खड़े हैं. ये अच्छी बात है कि उद्धव ठाकरे को संजय राउत पर पूरा भरोसा है. लेकिन सोचिए अगर संजय राउत वाकई सही हैं और उन्होंने कुछ नहीं किया तो फिर इस मामले का राजनीतिकरण करने की क्या जरूरत है? आज अगर आप ध्यान से देखेंगे तो हमारे देश में ईमानदारी का सारा बोझ आम आदमी पर डाल दिया गया है. लेकिन नेताओं को बेईमानी करने की खुली छूट मिली हुई है.

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